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Wednesday, 28 March 2018

जरूर पढ़ें - अनशन पे बैठे अन्ना हज़ारे ने बोला - अच्छा हुआ कि केजरीवाल हमारे साथ नहीं

अन्ना हज़ारे ने कहाँ - मैंने कई बार बताया हैं कि जो लोग मेरे साथ थे (केजरीवाल ) उन लोगो ने राजनीतिक पार्टी बनाली और जिस दिन उन लोगो ने राजनीतिक पार्टी बनाई उसी दिन से उनका और मेरा रास्ता अलग 

अन्ना हज़ारे


दिल्ली के रामलीला मैदान में समाजसेवी अन्ना हजारे के अनशन को 5 दिन से ज्यादा गुजर गये हैं। अपनी मांगों के समर्थन में अन्ना हजारे का अनशन जारी है। हालांकि रामलीला मैदान में अन्ना हजारे का आंदोलन तो चल रहा है लेकिन इस आंदोलन में भीड़ बहुत ज्यादा नहीं जुट रही है। इस बीच अन्ना हजारे ने कहा है कि अच्छा है कि अरविंद केजरीवाल मेरे साथ नहीं हैं। एक न्यूज चैनल से बातचीत करते हुए अन्ना हजारे ने कहा कि ‘मैंने कई बार बताया है कि जो लोग हमारे साथ थे, उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी बना ली। जिस दिन से उन्होंने पार्टी बनाई, उस दिन से मेरा और उनका कोई संबंध नहीं है। उनका और हमारा रास्ता अलग-अलग है।
आपको याद दिला दें कि साल 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में दिल्ली में ही भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन हुआ था। उस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास समेत कई लोगों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। उस वक्त भी केंद्र में यूपीए की सरकार थी और सरकार पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे थे। देश से भ्ष्टाचार खत्म करने और लोकपाल की नियुक्ति को लेकर अन्ना हजारे उस वक्त भी भूख हड़ताल पर बैठे थे। बाद में इसी आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल और दूसरे अन्य लोगों ने मिलकर आम आदमी पार्टी बना ली थी। राजनीतिक पार्टी बनाने के बाद से अन्ना हजारे अरविंद केजरीवाल से अलग हो गए थे।
अब एक बार फिर अन्ना हजारे दिल्ली मेंं अनिश्चितकालीन पर बैठे हैं। लोकपाल और लोकायुक्तों की नियुक्ति तथा देश में किसानों की हालत को लेकर अन्ना हजारे इस बार केंद्र की मोदी सरकार से बेहद नाराज हैं। अपने करीब 11 मांगों को लेकर अन्ना हजारे अनशन पर बैठे हैं। कई दिनों से अन्न नहीं ग्रहण करने की वजह से अन्ना हजारे की तबियत भी बिगड़ रही है। हालांकि डॉक्टर नियमित रुप से अन्ना की जांच कर रहे हैं। इस बीच अन्ना हजारे ने साफ कर दिया है कि जब तक उनमे सांस है तब तक उनका यह आंदोलन जारी रहेगा। खबर यह भी है कि अन्ना हजारे के कुछ मांगों पर सरकार ने अपनी सहमति जता दी है हालांकि अभी भी अन्ना हजारे सरकार पर दबाव बनाने और अपनी सभी मांगों को मनवाने के लिए अनशन पर बैठे हैं।

Narendra Modi अगर पाकिस्तान मे जाके नवाज से मिल सकते हैं तो हम ममता से क्यो नहीं - शिवसेना

शिवसेना सांसद संजय राउत ने एएनआई से कहा, ''प्रधानमंत्री 


पाकिस्‍तान जाकर नवाज शरीफ को मिल सकते हैं तो ममता बनर्जी तो


 एक राज्‍य की मुख्‍यमंत्री हैं। कभी ममता जी भी नेशनल डेमोक्रेटिक 


अलायंस (एनडीए) की एक प्रमुख घटक दल रही हैं।"


पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी इन दिनों दिल्‍ली में हैं। मंगलवार को वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सहयोगी शिवसेना के सांसदों और साथ ही कई विपक्षी दलों के सांसदों से मुलाकात करने पहुंची थीं। बनर्जी ने मंगलवार को संसद में शिवसेना के सांसद संजय राउत व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार से मुलाकात की। उन्होंने तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) की सांसद के.कविता से भी मुलाकात की। कविता तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव की बेटी हैं। बीजेपी ने सहयोगी दल से मुलाकात पर ममता की आलोचना की तो जवाब शिवसेना की तरफ से आया है।

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शिवसेना सांसद संजय राउत ने एएनआई से कहा, ”प्रधानमंत्री पाकिस्‍तान जाकर नवाज शरीफ को मिल सकते हैं तो ममता बनर्जी तो एक राज्‍य की मुख्‍यमंत्री हैं। कभी ममता जी भी नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) की एक प्रमुख घटक दल रही हैं। कोई अछूत नहीं है न ममता जी। अगर ममता जी आप बीजेपी के साथ होतीं तो क्‍या होता। आज ममता जी आपको (बीजेपी) अछूत लग रही हैं। वह एक राज्‍य की मुख्‍यमंत्री हैं।”
विपक्षी दलों के साथ मिलकर ममता बनर्जी भाजपा के खिलाफ एक मोर्चा बनाना चाहती हैं, मगर क्षेत्रीय दल कांग्रेस का नेतृत्‍व स्‍वीकार नहीं करना चाहते। रिपोर्ट्स के अनुससार, टीआरएस, बीजेडी जैसी क्षेत्रीय पार्टियां इस मोर्चे का हिस्‍सा बनने में हिचक रही हैं। बनर्जी इस पर जोर दे रहे हैं कि कांग्रेस मोर्चे का हिस्‍सा तो बने, मगर नेतृत्‍व न करे।

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यह मुलाकात ऐसे समय में हुई जब विपक्षी पार्टियां और साथ ही सरकार की पूर्व सहयोगी तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए एकजुट हुई हैं। हालांकि, इस मुलाकात का विवरण साझा नहीं किया गया। अगले लोकसभा चुनाव से पहले गैर-भाजपा राजनीतिक दलों के संभावित गठबंधन में ममता बनर्जी की भूमिका को प्रमुखता से देखा जा रहा है।

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ममता बनर्जी की कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात अभी तय नहीं है। मंगलवार को वह संसद में सोनिया गांधी से इसलिए नहीं मिल सकीं क्‍योंकि वह पहले ही चली गई थीं। बुधवार को ममता बीजेपी के नाराज चल रहे नेताओं- शत्रुघ्‍न सिन्‍हा, यशवंत सिन्‍हा और अरुण शौरी से मुलाकात कर सकती हैं।

Monday, 26 March 2018

मोदी सरकार के खिलाफ क्यों लाया जा रहा है अविश्वास प्रस्ताव, जानिए क्या है पूरी प्रोसेस

सरकार गिराना मुश्किल है। बीजेपी के खुद के 275 सांसद हैं ऐसे में अविश्वास प्रस्ताव लाने का क्या मकसद है?








स्पेशल डेस्क. लोकसभा में विपक्ष के हंगामे के चलते मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश नहीं हो सका। सदन में तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) और एआईएडीएम के सांसदों ने हंगामा किया। इस वजह से कार्यवाही को पहले 12 बजे और उसके बाद दिनभर के लिए स्थगित कर दिया गया। कार्यवाही स्थगित होने से पहले राजनाथ सिंह ने कहा कि सरकार अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के लिए तैयार है। बता दें कि टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस ने केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए तीन नोटिस दिए हैं। आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न मिलने से नाराज टीडीपी पहले एनडीए से अलग हुई और अब सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का सपोर्ट कर रही है।

क्या होता है अविश्वास प्रस्ताव
यह एक संसदीय प्रस्ताव है जिसे पारंपरिक रूप से विपक्ष संसद में सरकार को हराने या फिर कमजोर करने के लिए रखता है। अविश्वास प्रस्ताव उस वक्त भी लाया जाता है जब किसी पार्टी को लगे की सरकार के पास बहुतम नहीं है या सदन में सरकार विश्वास खो चुकी है। ऐसे में अविश्वास प्रस्ताव साबित होने पर सरकार गिर सकती है।
कैसे लाते हैं अविश्वास प्रस्ताव
अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए सबसे पहले सभापति को लिखित में सूचना देनी होती है। इसके बाद सभापति को इन्फॉर्म करने वाली पार्टी के किसी सांसद से प्रस्ताव पेश करने के लिए कहते हैं। लेकिन प्रस्ताव एक्सेप्ट हो, इसके लिए जरूरी है कि 50 सांसदों का सपोर्ट हो। इसके बाद वोटिंग कराई जाती है या फिर सपोर्ट करने वाले सांसदों को खड़ा कर गिनती की जाती है।
क्या अभी 50 सांसदों का सपोर्ट है?
अविश्वास प्रस्ताव के सपोर्ट में टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस खुलकर सामने आ चुकी हैं। टीडीपी के पास 16 और वाईएसआर कांग्रेस के पास 9 सांसद हैं। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ने भी प्रस्ताव का समर्थन किया है। उसके पास 34 सांसद हैं। ऐसे में तीनों पार्टियों के सांसद मिलाकर 59 हो जाते हैं जो कि प्रस्ताव पेश करने के लिए काफी हैं।
क्या मोदी सरकार गिर जाएगी?
अगर बीजेपी का ही कोई सांसद धोखा न दे तो सरकार नहीं गिरेगी। क्योंकि बीजेपी के पास स्पीकर समेत 275 सांसद हैं जो सहयोगियों के बिना अकेले ही सरकार बनाने के लिए काफी है। लोकसभा में कुल 545 निर्वाचित सांसद होते हैं। इस वक्त 5 सांसदों की सीट खाली है। इस वक्त सदन में 540 सांसद हैं। अब बहुमत साबित करने के लिए मौजूदा सांसदों के आधे से ज्यादा सांसद चाहिए। यानी 271 सांसद। जबकि बीजेपी के पास स्पीकर समेत 275 सांसद हैं जो सरकार बनाने के लिए काफी हैं। लोकसभा में दो एंग्लो इंडियन सदस्य भी होते हैं। राष्ट्रपति को लोकसभा में 2 एंग्लो इंडियन को मनोनीत करने का अधिकार हैं।
तो फिर अविश्वास प्रस्ताव लाने का क्या फायदा है?
अविश्वास प्रस्ताव लाने का सीधा मतलब सरकार को कमजोर साबित करना होता है। वर्तमान में भी यही करने की कोशिश की जा रही है। अविश्वास प्रस्ताव से विपक्षी पार्टियां बीजेपी के खिलाफ एकजुट होंगी। अविश्वास प्रस्ताव से भले ही सरकार बच जाए लेकिन उसके सामने चुनौतियां बढ़ जाएंगी।
स्पीकर की भूमिका
लोकसभा का स्पीकर तभी अपना मत देता है जब दोनों तरफ से बराबर मतदान हुआ हो। उस वक्त स्पीकर अपना वोट किसी भी एक पक्ष को देकर सरकार बना सकता है।
लोकसभा में सीटों की स्थिति
अभी लोकसभा में बीजेपी के 275 सांसद हैं। कांग्रेस के 48, AIADMK के 37, तृणमूल कांग्रेस के 34, बीजेडी के 20, शिवसेना के 18, टीडीपी के 16, टीआरएस के 11, सीपीआई (एम) के 9, वाईएसआर कांग्रेस के 9, समाजवादी पार्टी के 7, इनके अलावा 26 अन्य पार्टियों के 56 सांसद है। 5 सीटें अभी भी खाली हैं।
सहयोगियों की भूमिका
एऩडीए में सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी के पास स्पीकर समेत 275 सांसद हैं। उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना के पास 18, रामविलास पासवान की लोक जन शक्ति पार्टी (एलजेपी) के पास 6, अकाली दल के पास 4, उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के पास 3, जेडीयू के पास 2, अपना दल के पास 2 और 4 अन्य दलों के सांसद हैं। इन सबमें शिवसेना की भूमिका साफ नहीं है। हो सकता है वो वोटिंग में शामिल न हो। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को लेकर भी संशय की स्थिति बनी रहती है। अपना दल का भी एक सांसद बागी बताया जाता है। ऐसे में पासवान के 6, बादल के चार और नीतीश कुमार के 2 और महबूबा के एक सांसद का वोट पक्का माना जा रहा है।
कैसे गिर सकती है सरकार?
एनडीए की सरकार गिराना मुश्किल है लेकिन अगर बीजेपी के सांसद अंदर ही अंदर खेल कर दें तो एनडीएन के सहयोगी दलों की मदद से मोदी सरकार को अपना बहुमत साबित करना होगा। ऐसे में सवाल की आखिर बीजेपी के सांसद ऐसा क्यों करेंगे। दरअसल बीजेपी के कुछ सांसद कई बार पार्टी में रहकर ही सरकार का विरोध कर चुके हैं। पटना साहिब से सांसद शत्रुध्न सिन्हा, दरभंगा से कीर्ति आजाद, इलाहाबाद के सांसद श्याम चरण गुप्ता, बेगुसराय के सांसद भोला सिंह, ये वो लोग हैं जो बीजेपी में रहकर भी बीजेपी का विरोध कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इनके अलावा आधा दर्जन सांसद हैं जो नाखुश बताए जाते हैं। यानी अगर 10 सांसद भी बागी हो गए तो बीजेपी का आकड़ा 264 पर आ जाएगा। यानी पार्टी अपने दम पर बहुमत साबित नहीं कर पाएगी।

होने वाला है कुछ ऐसा कि एक गलती से टूट सकता है सपा और बसपा का गठबंधन !

उत्तर प्रदेश राज्यसभा चुनाव का हाल ऐसा रहा कि सपा ने अपने उम्मीदवार को राज्यसभा पहुंचा तो दिया लेकिन गठबंधन के आधार पर बसपा को राज्यसभा की चौखट तक नही पहुंचा पाई. इसके पहले जब ये गठबंधन बना था तब बसपा ने सपा को लोकसभा उपचुनाव में मदद की थी और नतीजा ये रहा था कि सपा के दो सांसद फूलपुर और गोरखपुर से जीते थे लेकिन यह गठबंधन राज्यसभा चुनाव में कुछ खास करामात नहीं दिखा पाया. अब एक बार फिर से अखिलेश यादव को मायावती के विधायकों की जरूरत पड़ेगी. बता दें कि मई में उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 12 सीटें खाली हो रही है ऐसे में अब देखना ये है कि क्या अब फिर से सपा का साथ बसपा देगी ?

NBT की खबर के मुताबिक मई के महीने में विधान परिषद की 12 सीटें खाली हो रही हैं, ऐसे में एक बार फिर से सपा और बसपा के गठबंधन की कड़ी परीक्षा होगी. परीक्षा इसलिए भी क्योंकि राज्यसभा में मनमुताबिक नतीजे ना आने की वजह से मायावती को निराशा हाथ लगी है, ऐसे में फिर से बसपा सपा को सपोर्ट करेगी या नहीं इस संशय बना हुआ है. बता दें कि मई में जो सीटें खाली हो रही हैं उनमें योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री मोहसिन रजा और महेंद्र सिंह के साथ यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव की भी सीट हैं.
हालाँकि जब गठबंधन हुआ था तब बसपा सुप्रीमों मायावती ने पहले ही साफ कर दिया था कि वो सपा को मदद करेंगी लेकिन राज्यसभा चुनाव में बसपा को फायदा ना मिलने से अब उम्मीदें लगाई जा रही हैं कि
 क्या मायावती अपने इस फैसले पर पुनः विचार करेंगी ? बसपा के सूत्रों का कहना है कि “विधान परिषद के चुनावों के लिए अभी कोई फैसला नहीं हुआ है. हम इसको लेकर बहन जी के फैसले का इंतजार कर रहे हैं. उसके बाद ही ये साफ हो पायेगा कि वो सपा को एमएलसी मदद करेंगे या नहीं.”
अब ऐसे में अगर बसपा ने विधान परिषद् चुनाव में सपा को सपोर्ट नहीं किया तो मुमकिन है कि ये गठबंधन जो मोदी सरकार को हराने का दावा कर रही है, वो खुद टूट जाये. अब देखना ये है कि मई के महीने में होने वाले इस चुनाव को लेकर मायावती कैसा रुख अख्तियार करती हैं.

Sunday, 25 March 2018

जरूर पढ़ें - खुद को महानायक समझने वाले अन्ना हजारे को जनता ने दिखाया आइना

 अन्ना हजारे को जनता ने दिखाया आइना , सारी जनता हैं अब मोदी जी के साथ 




अन्ना हजारे अब मोदी-मोदी कर रहे है - अन्ना हजारे का कहना है की मोदी के कारण लोग राम लीला मैदान में उनके आन्दोलन में नहीं आ रहे है, अन्ना हजारे के आन्दोलन में अब मात्र 100-150 लोग ही दिखाई देते है, वो भी शायद वो लोग है जो रामलीला मैदान के आसपास घूमते है, और फ्री के भोजन के लिए आ जाते है, अगर आप तस्वीरें देखें तो अधिकतर लोग ऐसे ही दिखाई देंगे 

अन्ना हजारे को लोगों ने जबरजस्त थप्पड़ मारा है, जो खुद को इस देश का महानायक समझ रहे थे, खुद को क्रन्तिकारी घोषित करवाते थे, पर जनता ने अन्ना हजारे को बता दिया की उनकी ये सोच गलत है, और उनकी हैसियत कुछ भी नहीं है, हुआ ये था की 2011 में अन्ना हजारे के साथ लाखों और करोडो की भीड़ थी, तब अन्ना हजारे ने सोचा की ये तो मेरा करिश्मा है 

पर ये बात सच नहीं थी, उस समय अन्ना हारे के साथ लोग इसलिए आ गए थे क्यूंकि देश में कांग्रेस की सरकार थी, सत्ता भ्रष्टाचारियों, अत्याचारियों के पास थी, और इसके खिलाफ जनता जंतर मंतर और राम लीला मैदान में आई थी, जिसे अन्ना ने अपना करिश्मा समझ लिया, जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ आई थी

पर आज वही जनता अन्ना हजारे के साथ नहीं है, और कारण ये है की जनता आज मोदी के साथ है, अन्ना हजारे ये आन्दोलन मोदी के खिलाफ कर रहे है, पर 200 लोग भी अन्ना हजारे के साथ नहीं है, क्यूंकि आज की जनता मोदी के साथ है, और समझ रही है की अन्ना हजारे स्पोंसर किया हुआ आन्दोलन कर रहे है, उनकी बातों में दम नहीं है इसलिए जनता उनके साथ नहीं है 

अन्ना हजारे को अब समझ लेना चाहिए की मोदी के साथ देश की जनता है, और अन्ना हजारे को असल में किसानो की फ़िक्र है तो उनके कर्णाटक सरकार के खिलाफ अनशन करना चाहिए, फिर जनता का भी साथ मिलेगा, क्यूंकि सबसे ज्यादा परेशान तो कर्णाटक का किसान है जहाँ कांग्रेस का राज है